Al-Fajr

سورة الفجر

सूरह 89 · मक्की · 30 आयतें

89:1जुज़ 30 · पृ. 593

وَالْفَجْرِ1

शपथ है भोर की!
89:2जुज़ 30 · पृ. 593

وَلَيَالٍ عَشْرٍ2

तथा दस रात्रियों की!
89:3जुज़ 30 · पृ. 593

وَالشَّفْعِ وَالْوَتْرِ3

और जोड़े तथा अकेले की!
89:4जुज़ 30 · पृ. 593

وَاللَّيْلِ إِذَا يَسْرِ4

और रात्रि की जब जाने लगे!
89:5जुज़ 30 · पृ. 593

هَلْ فِي ذَٰلِكَ قَسَمٌ لِذِي حِجْرٍ5

क्या उसमें किसी मतिमान (समझदार) के लिए कोई शपथ है?[1]
____________________
1. (1-5) इन आयतों में प्रथम परलोक के सुफल विष्यक चार संसारिक लक्षणों को साक्ष्य (गवाह) के रूप में परस्तुत किया गया है। जिस का अर्थ यह है कि कर्मों का फल सत्य है। रात तथा दिन का यह अनुक्रम जिस व्यवस्था के साथ चल रहा है उस से सिध्द होता है कि अल्लाह ही इसे चला रहा है। "दस रात्रियों" से अभिप्राय "ज़ुल ह़िज्जा" मास की प्रारम्भिक दस रातें हैं। सह़ीह़ ह़दीसों में इन की बड़ी प्रधानता बताई गई है।
89:6जुज़ 30 · पृ. 593

أَلَمْ تَرَ كَيْفَ فَعَلَ رَبُّكَ بِعَادٍ6

क्या तुमने नहीं देखा कि तुम्हारे पालनहार ने "आद" के सात क्या किया?
89:7जुज़ 30 · पृ. 593

إِرَمَ ذَاتِ الْعِمَادِ7

स्तम्भों वाले "इरम" के साथ?
89:8जुज़ 30 · पृ. 593

الَّتِي لَمْ يُخْلَقْ مِثْلُهَا فِي الْبِلَادِ8

जिनके समान देशों में लोग नहीं पैदा किये गये।
89:9जुज़ 30 · पृ. 593

وَثَمُودَ الَّذِينَ جَابُوا الصَّخْرَ بِالْوَادِ9

तथा "समूद" के साथ जिन्होंने घाटियों मे चट्टानों को काट रखा था।
89:10जुज़ 30 · पृ. 593

وَفِرْعَوْنَ ذِي الْأَوْتَادِ10

और मेखों वाले फ़िरऔन के साथ।
89:11जुज़ 30 · पृ. 593

الَّذِينَ طَغَوْا فِي الْبِلَادِ11

जिन्होंने नगरों में उपद्रव कर रखा था।
89:12जुज़ 30 · पृ. 593

فَأَكْثَرُوا فِيهَا الْفَسَادَ12

और नगरों में बड़ा उपद्रव फैला रखा था।
89:13जुज़ 30 · पृ. 593

فَصَبَّ عَلَيْهِمْ رَبُّكَ سَوْطَ عَذَابٍ13

फिर तेरे पालनहार ने उनपर दण्ड का कोड़ा बरसा दिया।
89:14जुज़ 30 · पृ. 593

إِنَّ رَبَّكَ لَبِالْمِرْصَادِ14

वास्तव में, तेरा पालनहार घात में है।[1]
____________________
1. (6-14) इन आयतों में उन जातियों की चर्चा की गई है जिन्हों ने माया मोह में पड़ कर परलोक और प्रतिफल का इन्कार किया, और अपने नैतिक पतन के कारण धरती में उग्रवाद किया। "आद, इरम" से अभिप्रेत वह पूरानी जाती है जिसे क़ुर्आन तथा अरब में "आदे ऊला" (प्रथम आद) कहा गया है। यह वह प्राचीन जाति है जिस के पास हूद (अलैहिस्सलाम) को भेजा गया। और इन को "आदे इरम" इस लिये कहा गया है कि यह शामी वंशक्रम की उस शाखा से संबंधित थे जो इरम बिन शाम बिन नूह़ से चली आती थी। आयत संख्या 11 में इस का संकेत है कि उग्रवाद का उद्गम भौतिकवाद एवं सत्य विश्वास का इन्कार है जिसे वर्तमान युग में भी प्रत्यक्ष रूप में देखा जा सकता है।
89:15जुज़ 30 · पृ. 593

فَأَمَّا الْإِنْسَانُ إِذَا مَا ابْتَلَاهُ رَبُّهُ فَأَكْرَمَهُ وَنَعَّمَهُ فَيَقُولُ رَبِّي أَكْرَمَنِ15

परन्तु, जब इन्सान की उसका पालनहार परीक्षा लेता है और उसे सम्मान और धन देता है, तो कहता है कि मेरे पालनहार ने मेरा सम्मान किया।
89:16जुज़ 30 · पृ. 593

وَأَمَّا إِذَا مَا ابْتَلَاهُ فَقَدَرَ عَلَيْهِ رِزْقَهُ فَيَقُولُ رَبِّي أَهَانَنِ16

परन्तु, जब उसकी परीक्षा लेने के लिए उसकी जीविका संकीर्ण (कम) कर देता है, तो कहता है कि मेरे पालनहार ने मेरा अपमान किया।
89:17जुज़ 30 · पृ. 593

كَلَّا ۖ بَلْ لَا تُكْرِمُونَ الْيَتِيمَ17

ऐसा नहीं, बल्कि तुम अनाथ का आदर नहीं करते।
89:18जुज़ 30 · पृ. 593

وَلَا تَحَاضُّونَ عَلَىٰ طَعَامِ الْمِسْكِينِ18

तथा ग़रीब को खाना खिलाने के लिए एक-दूसरे को नहीं उभारते।
89:19जुज़ 30 · पृ. 593

وَتَأْكُلُونَ التُّرَاثَ أَكْلًا لَمًّا19

और मीरास (मृतक सम्पत्ति) के धन को समेट-समेट कर खा जाते हो।
89:20जुज़ 30 · पृ. 593

وَتُحِبُّونَ الْمَالَ حُبًّا جَمًّا20

और धन से बड़ा मोह रखते हो।[1]
____________________
1. (15-20) इन आयतों में समाज की साधारण नैतिक स्थिति की परीक्षा (जायज़ा) ली गई, और भौतिकवादी विचार की आलोचना की गई है जो मात्र सांसारिक धन और मान मर्य़ादा को सम्मान तथा अपमान का पैमाना समझता है और यह भूल गया है कि न धनी होना कोई पुरस्कार है और न निर्धन होना कोई दण्ड है। अल्लाह दोनों स्थितियों में मानव जाति (इन्सान) की परीक्षा ले रहा है। फिर यह बात किसी के बस में हो तो दूसरे का धन भी हड़प कर जाये, क्या ऐसा करना कुकर्म नहीं जिस का ह़िसाब लिया जाये?
89:21जुज़ 30 · पृ. 593

كَلَّا إِذَا دُكَّتِ الْأَرْضُ دَكًّا دَكًّا21

सावधान! जब धरती खण्ड-खण्ड कर दी जायेगी।
89:22जुज़ 30 · पृ. 593

وَجَاءَ رَبُّكَ وَالْمَلَكُ صَفًّا صَفًّا22

और तेरा पालनहार स्वयं पदार्वण करेगा और फ़रिश्ते पंक्तियों में होंगे।
89:23जुज़ 30 · पृ. 594

وَجِيءَ يَوْمَئِذٍ بِجَهَنَّمَ ۚ يَوْمَئِذٍ يَتَذَكَّرُ الْإِنْسَانُ وَأَنَّىٰ لَهُ الذِّكْرَىٰ23

और उस दिन नरक लायी जायेगी, उस दिन इन्सान सावधान हो जायेगा, किन्तु सावधानी लाभ-दायक न होगी।
89:24जुज़ 30 · पृ. 594

يَقُولُ يَا لَيْتَنِي قَدَّمْتُ لِحَيَاتِي24

वह कामना करेगा के काश! अपने सदा कि जीवन के लिए कर्म किये होते।
89:25जुज़ 30 · पृ. 594

فَيَوْمَئِذٍ لَا يُعَذِّبُ عَذَابَهُ أَحَدٌ25

उस दिन (अल्लाह) के दण्ड के समान कोई दण्ड नहीं होगा।
89:26जुज़ 30 · पृ. 594

وَلَا يُوثِقُ وَثَاقَهُ أَحَدٌ26

और न उसके जैसी जकड़ कोई जकड़ेगा।[1]
____________________
1. (21-26) इन आयतों मे बताया गया है कि धन पूजने और उस से परलोक न बनाने का दुष्परिणाम नरक की घोर यातना के रूप में सामने आयेगा तब भौतिकवादी कुकर्मियों की समझ में आयेगा कि क़ुर्आन को न मान कर बड़ी भूल हुई और हाथ मलेंगे।
89:27जुज़ 30 · पृ. 594

يَا أَيَّتُهَا النَّفْسُ الْمُطْمَئِنَّةُ27

हे शान्त आत्मा!
89:28जुज़ 30 · पृ. 594

ارْجِعِي إِلَىٰ رَبِّكِ رَاضِيَةً مَرْضِيَّةً28

अपने पालनहार की ओर चल, तू उससे प्रसन्न, और वह तुझ से प्रसन्न।
89:29जुज़ 30 · पृ. 594

فَادْخُلِي فِي عِبَادِي29

तू मेरे भक्तों में प्रवेश कर जा।
89:30जुज़ 30 · पृ. 594

وَادْخُلِي جَنَّتِي30

और मेरे स्वर्ग में प्रवेश कर जा।[1]
____________________
1. (27-30) इन आयतों में उन के सुख और सफलता का वर्णन किया गया है जो क़ुर्आन की शिक्षा का अनुपालन करते हुये आत्मा की शाँति के साथ जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

सूरह के आरंभ से चलाएँ