Al-Qasas

سورة القصص

सूरह 28 · मक्की · 88 आयतें

28:1जुज़ 20 · पृ. 385

طسم1

ता, सीन, मीम।
28:2जुज़ 20 · पृ. 385

تِلْكَ آيَاتُ الْكِتَابِ الْمُبِينِ2

ये इस खुली पुस्तक की आयतें हैं।
28:3जुज़ 20 · पृ. 385

نَتْلُو عَلَيْكَ مِنْ نَبَإِ مُوسَىٰ وَفِرْعَوْنَ بِالْحَقِّ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ3

हम आपके समक्ष सुना रहे हैं, मूसा तथा फ़िरऔन के कुछ समाचार, सत्य के साथ, उन लोगों के लिए, जो ईमान रखते हैं।
28:4जुज़ 20 · पृ. 385

إِنَّ فِرْعَوْنَ عَلَا فِي الْأَرْضِ وَجَعَلَ أَهْلَهَا شِيَعًا يَسْتَضْعِفُ طَائِفَةً مِنْهُمْ يُذَبِّحُ أَبْنَاءَهُمْ وَيَسْتَحْيِي نِسَاءَهُمْ ۚ إِنَّهُ كَانَ مِنَ الْمُفْسِدِينَ4

वास्तव में, फ़िरऔन ने उपद्रव किया धरती में और कर दिया उसके निवासियों को कई गिरोह। वह निर्बल बना रहा था एक गिरोह को उनमें से, वध कर रहा था उनके पुत्रों को और जीवित रहने देता था उनकी स्त्रियों को। निश्चय वह उपद्रवियों में से था।
28:5जुज़ 20 · पृ. 385

وَنُرِيدُ أَنْ نَمُنَّ عَلَى الَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا فِي الْأَرْضِ وَنَجْعَلَهُمْ أَئِمَّةً وَنَجْعَلَهُمُ الْوَارِثِينَ5

तथा हम चाहते थे कि उनपर दया करें, जो निर्बल बना दिये गये धरती में तथा बना दें उन्हीं को प्रमुख और बना दें उन्हीं को[1] उत्तराधिकारी।
____________________
1. अर्थात मिस्र देश का राज्य उन्हीं को प्रदान कर दें।
28:6जुज़ 20 · पृ. 386

وَنُمَكِّنَ لَهُمْ فِي الْأَرْضِ وَنُرِيَ فِرْعَوْنَ وَهَامَانَ وَجُنُودَهُمَا مِنْهُمْ مَا كَانُوا يَحْذَرُونَ6

तथा उन्हें शक्ति प्रदान कर दें और दिखा दें फ़िरऔन तथा हामान और उनकी सेनाओं को उनकी ओर से वह, जिससे वे डर रहे[1] थे।
____________________
1. अर्थात बनी इस्राईल के हाथों अपने राज्य के पतन से।
28:7जुज़ 20 · पृ. 386

وَأَوْحَيْنَا إِلَىٰ أُمِّ مُوسَىٰ أَنْ أَرْضِعِيهِ ۖ فَإِذَا خِفْتِ عَلَيْهِ فَأَلْقِيهِ فِي الْيَمِّ وَلَا تَخَافِي وَلَا تَحْزَنِي ۖ إِنَّا رَادُّوهُ إِلَيْكِ وَجَاعِلُوهُ مِنَ الْمُرْسَلِينَ7

और हमने वह़्यी[1] की मूसा की माता की ओर कि उसे दूध पिलाती रह और जब तुझे उसपर भय हो, तो उसे सागर में डाल दे और भय न कर और न चिन्ता कर, निःसंदेह, हम वापस लायेंगे उसे तेरी ओर और बना देंगे उसे रसूलों में से।
____________________
1. जब मूसा का जन्म हुआ तो अल्लाह ने उन के माता के मन में यह बातें डाल दीं।
28:8जुज़ 20 · पृ. 386

فَالْتَقَطَهُ آلُ فِرْعَوْنَ لِيَكُونَ لَهُمْ عَدُوًّا وَحَزَنًا ۗ إِنَّ فِرْعَوْنَ وَهَامَانَ وَجُنُودَهُمَا كَانُوا خَاطِئِينَ8

तो ले लिया उसे फ़िरऔन के कर्मचारियों ने,[1] ताकि वह बने उनके लिए शत्रु तथा दुःख का कारण। वास्तव में, फ़िरऔन तथा हामान और उनकी सेनाएँ दोषी थीं।
____________________
1. अर्थात उसे एक संदूक में रख कर सागर में डाल दिया जिसे फ़िरऔन की पत्नि ने निकाल कर उसे (मूसा को) अपना पुत्र बना लिया।
28:9जुज़ 20 · पृ. 386

وَقَالَتِ امْرَأَتُ فِرْعَوْنَ قُرَّتُ عَيْنٍ لِي وَلَكَ ۖ لَا تَقْتُلُوهُ عَسَىٰ أَنْ يَنْفَعَنَا أَوْ نَتَّخِذَهُ وَلَدًا وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ9

और फ़िरऔन की पत्नि ने कहाः ये मेरी तथा आपकी आँखों की ठण्डक है। इसे वध न कीजिये, संभव है हमें लाभ पहुँचाये या उसे हम पुत्र बना लें और वे समझ नहीं रहे थे।
28:10जुज़ 20 · पृ. 386

وَأَصْبَحَ فُؤَادُ أُمِّ مُوسَىٰ فَارِغًا ۖ إِنْ كَادَتْ لَتُبْدِي بِهِ لَوْلَا أَنْ رَبَطْنَا عَلَىٰ قَلْبِهَا لِتَكُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ10

और हो गया मूसा की माँ का दिल व्याकूल, समीप था कि वह उसका भेद खोल देती, यदि हम आश्वासन न देते उसके दिल को, ताकि वह हो जाये विश्वास करने वालों में।
28:11जुज़ 20 · पृ. 386

وَقَالَتْ لِأُخْتِهِ قُصِّيهِ ۖ فَبَصُرَتْ بِهِ عَنْ جُنُبٍ وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ11

तथा (मूसा की माँ ने) कहा उसकी बहन से कि तू इसके पीछे-पीछे जा। और उसने उसे दूर ही दूर से देखा और उन्हें इसका आभास तक न हुआ।
28:12जुज़ 20 · पृ. 386

۞ وَحَرَّمْنَا عَلَيْهِ الْمَرَاضِعَ مِنْ قَبْلُ فَقَالَتْ هَلْ أَدُلُّكُمْ عَلَىٰ أَهْلِ بَيْتٍ يَكْفُلُونَهُ لَكُمْ وَهُمْ لَهُ نَاصِحُونَ12

और हमने अवैध (निषेध) कर दिया उस (मूसा) पर दाइयों को इससे[1] पूर्व। तो उस (की बहन) ने कहाः क्या मैं तुम्हें न बताऊँ ऐसा घराना, जो पालनपोषण करें इसका तुम्हारे लिए तथा वे उसके शुभचिनतक हों?
____________________
1. अर्थात उस की माता के पास आने से पूर्व।
28:13जुज़ 20 · पृ. 386

فَرَدَدْنَاهُ إِلَىٰ أُمِّهِ كَيْ تَقَرَّ عَيْنُهَا وَلَا تَحْزَنَ وَلِتَعْلَمَ أَنَّ وَعْدَ اللَّهِ حَقٌّ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ13

तो हमने फेर दिया उसे उसकी माँ की ओर, ताकि ठण्डी हो उसकी आँख और चिन्ता न करे और ताकि उसे विश्वास हो जाये कि अल्लाह का वचन सच है, परन्तु अधिक्तर लोग विश्वास नहीं रखते।
28:14जुज़ 20 · पृ. 387

وَلَمَّا بَلَغَ أَشُدَّهُ وَاسْتَوَىٰ آتَيْنَاهُ حُكْمًا وَعِلْمًا ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ14

और जब वह अपनी युवावस्था को पहुँचा और उसका विकास पूरा हो गया, तो हमने उसे प्रबोध तथा ज्ञान दिया और इसी प्रकार, हम बदला देते हैं सदाचारियों को।
28:15जुज़ 20 · पृ. 387

وَدَخَلَ الْمَدِينَةَ عَلَىٰ حِينِ غَفْلَةٍ مِنْ أَهْلِهَا فَوَجَدَ فِيهَا رَجُلَيْنِ يَقْتَتِلَانِ هَٰذَا مِنْ شِيعَتِهِ وَهَٰذَا مِنْ عَدُوِّهِ ۖ فَاسْتَغَاثَهُ الَّذِي مِنْ شِيعَتِهِ عَلَى الَّذِي مِنْ عَدُوِّهِ فَوَكَزَهُ مُوسَىٰ فَقَضَىٰ عَلَيْهِ ۖ قَالَ هَٰذَا مِنْ عَمَلِ الشَّيْطَانِ ۖ إِنَّهُ عَدُوٌّ مُضِلٌّ مُبِينٌ15

और उसने प्रवेश किया नगर में उसके वासियों की अचेतना के समय और उसमें दो व्यक्तियों को लड़ते हुए पाया, ये उसके गिरोह से था और दूसरा उसके शत्रु में[1] से। तो पुकारा उसने, जो उसके गिरोह से था, उसके विरुध्द, जो उसके शत्रु में से था। जिसपर मूसा ने उसे घूँसा मारा और वह मर गया। मूसा ने कहाः ये शैतानी कर्म है। वास्तव में, वह शत्रु है खुला, कुपथ करने वाला।
____________________
1. अर्थात एक इस्राईली तथा दूसरा क़िब्ती फ़िरऔन की जाति से था।
28:16जुज़ 20 · पृ. 387

قَالَ رَبِّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي فَاغْفِرْ لِي فَغَفَرَ لَهُ ۚ إِنَّهُ هُوَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ16

उसने कहाः हे मेरे पालनहार! मैंने अपने ऊपर अत्याचार कर लिया, तू मुझे क्षमा कर दे। फिर अल्लाह ने उसे क्षमा कर दिया। वास्तव में, वह क्षमाशील, अति दयावान् है।
28:17जुज़ 20 · पृ. 387

قَالَ رَبِّ بِمَا أَنْعَمْتَ عَلَيَّ فَلَنْ أَكُونَ ظَهِيرًا لِلْمُجْرِمِينَ17

उसने कहाः उसके कारण, जो तूने मुझपर पुरस्कार किया है, अब मैं कदापि अपराधियों का सहायक नहीं बनूँगा।
28:18जुज़ 20 · पृ. 387

فَأَصْبَحَ فِي الْمَدِينَةِ خَائِفًا يَتَرَقَّبُ فَإِذَا الَّذِي اسْتَنْصَرَهُ بِالْأَمْسِ يَسْتَصْرِخُهُ ۚ قَالَ لَهُ مُوسَىٰ إِنَّكَ لَغَوِيٌّ مُبِينٌ18

फिर प्रातः वह नगर में डरता हुआ समाचार लेने गया, तो सहसा वही जिसने उससे कल सहायता माँगी थी, उसे पुकार रहा है। मूसा ने उससे कहाः वास्तव में, तूही खुला कुपथ है।
28:19जुज़ 20 · पृ. 387

فَلَمَّا أَنْ أَرَادَ أَنْ يَبْطِشَ بِالَّذِي هُوَ عَدُوٌّ لَهُمَا قَالَ يَا مُوسَىٰ أَتُرِيدُ أَنْ تَقْتُلَنِي كَمَا قَتَلْتَ نَفْسًا بِالْأَمْسِ ۖ إِنْ تُرِيدُ إِلَّا أَنْ تَكُونَ جَبَّارًا فِي الْأَرْضِ وَمَا تُرِيدُ أَنْ تَكُونَ مِنَ الْمُصْلِحِينَ19

फिर जब पकड़ना चाहा उसे, जो उन दोनों का शत्रु था, तो उसने कहाः हे मूसा! क्या तू मुझे मार देना चाहता है, जैसे मार दिया एक व्यक्ति को कल? तू तो चाहता है कि बड़ा उपद्रवी बनकर रहे इस धरती में और तू नहीं चाहता कि सुधार करने वालों में से हो।
28:20जुज़ 20 · पृ. 387

وَجَاءَ رَجُلٌ مِنْ أَقْصَى الْمَدِينَةِ يَسْعَىٰ قَالَ يَا مُوسَىٰ إِنَّ الْمَلَأَ يَأْتَمِرُونَ بِكَ لِيَقْتُلُوكَ فَاخْرُجْ إِنِّي لَكَ مِنَ النَّاصِحِينَ20

और आया एक पुरुष नगर के किनारे से दौड़ता हुआ, उसने कहाः हे मूसा! (राज्य के) प्रमुख प्रामर्श कर रहे हैं तेरे विषय में कि तुझे वध कर दें, अतः तू निकल जा। वास्तव में, मैं तेरे शुभचिन्तकों में से हूँ।
28:21जुज़ 20 · पृ. 387

فَخَرَجَ مِنْهَا خَائِفًا يَتَرَقَّبُ ۖ قَالَ رَبِّ نَجِّنِي مِنَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ21

तो वह निकल गया उस (नगर) से डरा सहमा हुआ। उसने प्रार्थना कीः हे मेरे पालनहार! मुझे बचा ले अत्याचारी जाति से।
28:22जुज़ 20 · पृ. 388

وَلَمَّا تَوَجَّهَ تِلْقَاءَ مَدْيَنَ قَالَ عَسَىٰ رَبِّي أَنْ يَهْدِيَنِي سَوَاءَ السَّبِيلِ22

और जब वह जाने लगा मद्यन की ओर, तो उसने कहाः मूझे आशा है कि मेरा पालनहार मुझे दिखायेगा सीधा मार्ग।
28:23जुज़ 20 · पृ. 388

وَلَمَّا وَرَدَ مَاءَ مَدْيَنَ وَجَدَ عَلَيْهِ أُمَّةً مِنَ النَّاسِ يَسْقُونَ وَوَجَدَ مِنْ دُونِهِمُ امْرَأَتَيْنِ تَذُودَانِ ۖ قَالَ مَا خَطْبُكُمَا ۖ قَالَتَا لَا نَسْقِي حَتَّىٰ يُصْدِرَ الرِّعَاءُ ۖ وَأَبُونَا شَيْخٌ كَبِيرٌ23

और जब उतरा मद्यन के पानी पर, तो पाया उसपर लोगों का एक समूह, जो (अपने पशुओं को) पानी पिला रहा था तथा पाया उसके पीछे दो स्त्रियों को (अपने पशुओं को) रोकती हुईं। उसने कहाः तुम्हारी समस्या क्या है? दोनों ने कहाः हम पानी नहीं पिलातीं, जब तक चरवाहे चले न जायें और हमारे पिता बहुत बूढ़े हैं।

فَسَقَىٰ لَهُمَا ثُمَّ تَوَلَّىٰ إِلَى الظِّلِّ فَقَالَ رَبِّ إِنِّي لِمَا أَنْزَلْتَ إِلَيَّ مِنْ خَيْرٍ فَقِيرٌ24

तो उसने पिला दिया दोनों के लिए। फिर चल दिया छाया की ओर और कहने लगाः हे मेरे पालनहार! तू, जोभी भलाई मुझपर उतार दे, मैं उसका आकांक्षी हूँ।
28:25जुज़ 20 · पृ. 388

فَجَاءَتْهُ إِحْدَاهُمَا تَمْشِي عَلَى اسْتِحْيَاءٍ قَالَتْ إِنَّ أَبِي يَدْعُوكَ لِيَجْزِيَكَ أَجْرَ مَا سَقَيْتَ لَنَا ۚ فَلَمَّا جَاءَهُ وَقَصَّ عَلَيْهِ الْقَصَصَ قَالَ لَا تَخَفْ ۖ نَجَوْتَ مِنَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ25

तो आई उसके पास दोनों में से एक स्त्री चलती हुई लज्जा के साथ, उसने कहाः मेरे पिता[1] आपको बुला रहे हैं। ताकि आपको उसका पारिश्रमिक दें, जो आपने पानी पिलाया है हमारे लिए। फिर जब (मूसा) उसके पास पहुँचा और पूरी कथा उसे सुनाई, तो उसने कहाः भय न कर। तू मुक्त हो गया अत्याचारी[2] जाति से।
____________________
1. व्याख्या कारों ने लिखा है कि वह आदरणीय शोऐब (अलैहिस्सलाम) थे जो मद्यन के नबी थे। (देखियेः इब्ने कसीर) 2. अर्थात फ़िरऔनियों से।
28:26जुज़ 20 · पृ. 388

قَالَتْ إِحْدَاهُمَا يَا أَبَتِ اسْتَأْجِرْهُ ۖ إِنَّ خَيْرَ مَنِ اسْتَأْجَرْتَ الْقَوِيُّ الْأَمِينُ26

कहा उन दोनों में से एक नेः हे पिता! आप इन्हें सेवक रख लें, सबसे उत्तम जिसे आपसेवक बनायें वही हो सकता है, जो प्रबल विश्वसनीय हो।
28:27जुज़ 20 · पृ. 388

قَالَ إِنِّي أُرِيدُ أَنْ أُنْكِحَكَ إِحْدَى ابْنَتَيَّ هَاتَيْنِ عَلَىٰ أَنْ تَأْجُرَنِي ثَمَانِيَ حِجَجٍ ۖ فَإِنْ أَتْمَمْتَ عَشْرًا فَمِنْ عِنْدِكَ ۖ وَمَا أُرِيدُ أَنْ أَشُقَّ عَلَيْكَ ۚ سَتَجِدُنِي إِنْ شَاءَ اللَّهُ مِنَ الصَّالِحِينَ27

उसने कहाः मैं चाहता हूँ कि विवाह दूँ तुम्हें अपनी इन दो पुत्रियों में से एक से, इसपर कि मेरी सेवा करोगे आठ वर्ष, फिर यदि तुम पूरा कर दो दस (वर्ष) तो ये तुम्हारी इच्छा है। मैं नहीं चाहता कि तुमपर बोझ डालूँ और तुम मुझे पाओगे यदि अल्लाह ने चाहा, तो सदाचारियों में से।
28:28जुज़ 20 · पृ. 388

قَالَ ذَٰلِكَ بَيْنِي وَبَيْنَكَ ۖ أَيَّمَا الْأَجَلَيْنِ قَضَيْتُ فَلَا عُدْوَانَ عَلَيَّ ۖ وَاللَّهُ عَلَىٰ مَا نَقُولُ وَكِيلٌ28

मूसा ने कहाः ये मेरे और आपके बीच (निश्चित) है। मैं दो में से जो भी अवधि पूरी कर दूँ, मुझपर कोई अत्याचार न हो और अल्लाह उसपर, जो हम कह रहे हैं निरीक्षक है।
28:29जुज़ 20 · पृ. 389

۞ فَلَمَّا قَضَىٰ مُوسَى الْأَجَلَ وَسَارَ بِأَهْلِهِ آنَسَ مِنْ جَانِبِ الطُّورِ نَارًا قَالَ لِأَهْلِهِ امْكُثُوا إِنِّي آنَسْتُ نَارًا لَعَلِّي آتِيكُمْ مِنْهَا بِخَبَرٍ أَوْ جَذْوَةٍ مِنَ النَّارِ لَعَلَّكُمْ تَصْطَلُونَ29

फिर जब पूरी कर ली मूसा ने अवधि और चला अपने परिवार के साथ, तो उसने देखी तूर (पर्वत) की ओर एक अग्नि। उसने अपने परिवार से कहाः रुको मैंने देखी है एक अग्नि, संभव है तुम्हारे पास लाऊँ वहाँ से कोई समाचार अथवा कोई अंगार अग्नि का, ताकि तुम ताप लो।
28:30जुज़ 20 · पृ. 389

فَلَمَّا أَتَاهَا نُودِيَ مِنْ شَاطِئِ الْوَادِ الْأَيْمَنِ فِي الْبُقْعَةِ الْمُبَارَكَةِ مِنَ الشَّجَرَةِ أَنْ يَا مُوسَىٰ إِنِّي أَنَا اللَّهُ رَبُّ الْعَالَمِينَ30

फिर जब वह वहाँ आया, तो पुकारा गया वादी के दायें किनारे से, शुभ क्षेत्र में वृक्ष सेः हे मूसा! निःसंदेह, मैं ही अल्लाह हूँ, सर्वलोक का पालनहार।
28:31जुज़ 20 · पृ. 389

وَأَنْ أَلْقِ عَصَاكَ ۖ فَلَمَّا رَآهَا تَهْتَزُّ كَأَنَّهَا جَانٌّ وَلَّىٰ مُدْبِرًا وَلَمْ يُعَقِّبْ ۚ يَا مُوسَىٰ أَقْبِلْ وَلَا تَخَفْ ۖ إِنَّكَ مِنَ الْآمِنِينَ31

और फेंक दो अपनी लाठी, फिर जब उसे देखा कि रेंग रही है, मानो वह कोई सर्प हो, तो भागने लगा पीठ फेरकर और पीछे फिरकर नहीं देखा। हे मूसा! आगे आ तथा भय न कर, वास्तव में, तू सुरक्षितों में से है।
28:32जुज़ 20 · पृ. 389

اسْلُكْ يَدَكَ فِي جَيْبِكَ تَخْرُجْ بَيْضَاءَ مِنْ غَيْرِ سُوءٍ وَاضْمُمْ إِلَيْكَ جَنَاحَكَ مِنَ الرَّهْبِ ۖ فَذَانِكَ بُرْهَانَانِ مِنْ رَبِّكَ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَئِهِ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا قَوْمًا فَاسِقِينَ32

डाल अपना हाथ अपनी जेब में, वह निकलेगा उज्ज्वल होकर बिना किसी रोग के और चिमटा ले अपनी ओर अपनी भुजा, भय दूर करने के लिए, तो ये दो खुली निशानियाँ हैं तेरे पालनहार की ओर से फ़िरऔन तथा उसके प्रमुखों के लिए, वास्तव में, वह उल्लंघनकारी जाति हैं।
28:33जुज़ 20 · पृ. 389

قَالَ رَبِّ إِنِّي قَتَلْتُ مِنْهُمْ نَفْسًا فَأَخَافُ أَنْ يَقْتُلُونِ33

उसने कहाः मेरे पालनहार! मैंने वध किया है उनके एक व्यक्ति को। अतः, मैं डरता हूँ कि वे मुझे मार देंगे।
28:34जुज़ 20 · पृ. 389

وَأَخِي هَارُونُ هُوَ أَفْصَحُ مِنِّي لِسَانًا فَأَرْسِلْهُ مَعِيَ رِدْءًا يُصَدِّقُنِي ۖ إِنِّي أَخَافُ أَنْ يُكَذِّبُونِ34

और मेरा भाई हारून मुझसे अधिक सुभाषी है, तू उसे भी भेज दे मेरे साथ सहायक बनाकर, ताकि वह मेरा समर्थन करे, मैं डरता हूँ कि वे मुझे झुठला देंगे।
28:35जुज़ 20 · पृ. 389

قَالَ سَنَشُدُّ عَضُدَكَ بِأَخِيكَ وَنَجْعَلُ لَكُمَا سُلْطَانًا فَلَا يَصِلُونَ إِلَيْكُمَا ۚ بِآيَاتِنَا أَنْتُمَا وَمَنِ اتَّبَعَكُمَا الْغَالِبُونَ35

उसने कहाः हम तुझे बाहुबल प्रदान करेंगे तेरे भाई द्वारा और बनायेंगे तुम दोनों के लिए ऐसा प्रभाव कि वे तुम दोनों तक नहीं पहुँच सकेंगे अपनी निशानियों द्वारा, तुम दोनों तथा तुम्हारे अनुयायी ही ऊपर रहेंगे।
28:36जुज़ 20 · पृ. 390

فَلَمَّا جَاءَهُمْ مُوسَىٰ بِآيَاتِنَا بَيِّنَاتٍ قَالُوا مَا هَٰذَا إِلَّا سِحْرٌ مُفْتَرًى وَمَا سَمِعْنَا بِهَٰذَا فِي آبَائِنَا الْأَوَّلِينَ36

फिर जब मूसा उनके पास हमारी खुली निशानियाँ लाया, तो उन्होंने कह दिया कि ये तो केवल घड़ा हुआ जादू है और हमने कभी नहीं सुनी ये बात अपने पूर्वजों के युग में।
28:37जुज़ 20 · पृ. 390

وَقَالَ مُوسَىٰ رَبِّي أَعْلَمُ بِمَنْ جَاءَ بِالْهُدَىٰ مِنْ عِنْدِهِ وَمَنْ تَكُونُ لَهُ عَاقِبَةُ الدَّارِ ۖ إِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الظَّالِمُونَ37

तथा मूसा ने कहाः मेरा पालनहार अधिक जानता है उसे, जो मार्गदर्शन लाया है उसके पास से और किसका अन्त अच्छा होना है? वास्तव में, अत्याचारी सफल नहीं होंगे।
28:38जुज़ 20 · पृ. 390

وَقَالَ فِرْعَوْنُ يَا أَيُّهَا الْمَلَأُ مَا عَلِمْتُ لَكُمْ مِنْ إِلَٰهٍ غَيْرِي فَأَوْقِدْ لِي يَا هَامَانُ عَلَى الطِّينِ فَاجْعَلْ لِي صَرْحًا لَعَلِّي أَطَّلِعُ إِلَىٰ إِلَٰهِ مُوسَىٰ وَإِنِّي لَأَظُنُّهُ مِنَ الْكَاذِبِينَ38

तथा फ़िरऔन ने कहाः हे प्रमुखो! मैं नहीं जानता तुम्हारा कोई पूज्य अपने सिवा। तो हे हामान! ईंटें पकवाकर मेरे लिए एक ऊँचा भवन बना दे। संभव है, मैं झाँककर देख लूँ मूसा के पूज्य को और निश्चय मैं उसे समझता हूँ झूठों में से।
28:39जुज़ 20 · पृ. 390

وَاسْتَكْبَرَ هُوَ وَجُنُودُهُ فِي الْأَرْضِ بِغَيْرِ الْحَقِّ وَظَنُّوا أَنَّهُمْ إِلَيْنَا لَا يُرْجَعُونَ39

तथा घमंड किया उसने तथा उसकी सेनाओं ने धरती में अवैध और उन्होंने समझा कि वह हमारी ओर वापस नहीं लाये जायेंगे।
28:40जुज़ 20 · पृ. 390

فَأَخَذْنَاهُ وَجُنُودَهُ فَنَبَذْنَاهُمْ فِي الْيَمِّ ۖ فَانْظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الظَّالِمِينَ40

तो हमने पकड़ लिया उसे और उसकी सेनाओं को, फिर फेंक दिया हमने उन्हें सागर में, तो देखो कि कैसा रहा अत्याचारियों का अन्त (परिणाम)।
28:41जुज़ 20 · पृ. 390

وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ ۖ وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ لَا يُنْصَرُونَ41

और हमने उन्हें बना दिया ऐसा अगवा, जो बुलाते हों नरक की ओर तथा प्रलय के दिन उनकी सहायता नहीं की जायेगी।
28:42जुज़ 20 · पृ. 390

وَأَتْبَعْنَاهُمْ فِي هَٰذِهِ الدُّنْيَا لَعْنَةً ۖ وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ هُمْ مِنَ الْمَقْبُوحِينَ42

और हमने पीछे लगा दिया उनके संसार में धिक्कार को और प्रलय के दिन वे बड़ी दुर्दशा में होंगे।
28:43जुज़ 20 · पृ. 390

وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ مِنْ بَعْدِ مَا أَهْلَكْنَا الْقُرُونَ الْأُولَىٰ بَصَائِرَ لِلنَّاسِ وَهُدًى وَرَحْمَةً لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ43

और हमने मूसा को पुस्तक प्रदान की इसके पश्चात् कि हमने विनाश कर दिया प्रथम समुदायों का, ज्ञान का साधन बनाकर लोगों के लिए तथा मार्गदर्शन और दया, ताकि वे शिक्षा लें।
28:44जुज़ 20 · पृ. 391

وَمَا كُنْتَ بِجَانِبِ الْغَرْبِيِّ إِذْ قَضَيْنَا إِلَىٰ مُوسَى الْأَمْرَ وَمَا كُنْتَ مِنَ الشَّاهِدِينَ44

और (हे नबी!) आप नहीं थे पश्चिमी दिशा में,[1] जब हमने पहुँचाया मूसा की ओर ये आदेश और आप नहीं थे उपस्थितों[2] में।
____________________
1. पश्चिमी दिशा से अभिप्राय तूर पर्वत का पश्चिमी भाग है जहाँ मूसा (अलैहिस्सलाम) को तौरात प्रदान की गई। 2. इन से अभिप्राय वह बनी इस्राईल हैं जिन से धर्मविधान प्रदान करते समय उस का पालन करने का वचन लिया गया था।
28:45जुज़ 20 · पृ. 391

وَلَٰكِنَّا أَنْشَأْنَا قُرُونًا فَتَطَاوَلَ عَلَيْهِمُ الْعُمُرُ ۚ وَمَا كُنْتَ ثَاوِيًا فِي أَهْلِ مَدْيَنَ تَتْلُو عَلَيْهِمْ آيَاتِنَا وَلَٰكِنَّا كُنَّا مُرْسِلِينَ45

परन्तु (आपके समय तक) हमने बहुत-से समुदायों को पैदा किया, फिर उनपर लम्बी अवधि बीत गयी तथा आप उपस्थित न थे मद्यन के वासियों में कि सुनाते उन्हें हमारी आयतें और परन्तु हमभी रसूलों को भेजने[1] वाले हैं।
____________________
1. भावार्थ यह कि आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हज़ारों पर्ष पहले के जो समाचार इस समय सुना रहे हैं जैसे आँखों से देखें हों वह अल्लाह की ओर से वह़्यी के कारण ही सुना रहे हैं जो आप के सच्चे नबी होने का प्रमाण है।
28:46जुज़ 20 · पृ. 391

وَمَا كُنْتَ بِجَانِبِ الطُّورِ إِذْ نَادَيْنَا وَلَٰكِنْ رَحْمَةً مِنْ رَبِّكَ لِتُنْذِرَ قَوْمًا مَا أَتَاهُمْ مِنْ نَذِيرٍ مِنْ قَبْلِكَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ46

तथा नहीं थे आप तूर के अंचल में, जब हमने उसे पुकारा, परन्तु आपके पालनहार की दया है, ताकि आप सतर्क करें जिनके पास नहीं आया कोई सचेत करने वाला आपसे पूर्व, ताकि वे शिक्षा ग्रहण करें।
28:47जुज़ 20 · पृ. 391

وَلَوْلَا أَنْ تُصِيبَهُمْ مُصِيبَةٌ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ فَيَقُولُوا رَبَّنَا لَوْلَا أَرْسَلْتَ إِلَيْنَا رَسُولًا فَنَتَّبِعَ آيَاتِكَ وَنَكُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ47

तथा यदि ये बात न होती कि उनपर कोई आपदा आ जाती उनके करतूतों के कारण, तो कहते कि हमारे पालनहार! तूने क्यों नहीं भेजा हमारे पास कोई रसूल कि हम पालन करते तेरी आयतों का और हो जाते ईमान वालों में से[1]।
____________________
1. अर्थात आप को उन की ओर रसूल बना कर इस लिए भेजा है ताकि प्रलय के दिन उन को यह कहने का अवसर न मिले कि हमारे पास कोई रसूल नहीं आया ताकि हम ईमान लाते।
28:48जुज़ 20 · पृ. 391

فَلَمَّا جَاءَهُمُ الْحَقُّ مِنْ عِنْدِنَا قَالُوا لَوْلَا أُوتِيَ مِثْلَ مَا أُوتِيَ مُوسَىٰ ۚ أَوَلَمْ يَكْفُرُوا بِمَا أُوتِيَ مُوسَىٰ مِنْ قَبْلُ ۖ قَالُوا سِحْرَانِ تَظَاهَرَا وَقَالُوا إِنَّا بِكُلٍّ كَافِرُونَ48

फिर जब आ गया उनके पास सत्य हमारे पास से, तो कह दिया कि क्यों नहीं दिया गया उसे वही, जो मूसा को (चमत्कार) दिया गया? तो क्या उन्होंने कुफ़्र (इन्कार) नहीं किया उसका, जो मूसा दिये गये इससे पूर्व? उन्होंने कहाः दो[1] जादूगर हैं, दोनो एक-दूसरे के सहायक हैं और कहाः हम किसी को नहीं मानते।
____________________
1. अर्थात मूसा (अलैहिस्सलाम) तथा उन के भाई हारून (अलैहिस्सलाम)। और भावार्थ यह है कि चमत्कारों की माँग, न मानने का बहाना है।
28:49जुज़ 20 · पृ. 391

قُلْ فَأْتُوا بِكِتَابٍ مِنْ عِنْدِ اللَّهِ هُوَ أَهْدَىٰ مِنْهُمَا أَتَّبِعْهُ إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ49

(हे नबी!) आप कह दें: तब तुम्हीं ले आओ कोई पुस्तक अल्लाह की ओर से, जो अधिक मार्गदर्शक हो इन दोनों[1] से, मैं चलूँगा उसपर, यदि तुम सच्चे हो।
____________________
1. अर्थात क़ुर्आन और तौरात से।
28:50जुज़ 20 · पृ. 391

فَإِنْ لَمْ يَسْتَجِيبُوا لَكَ فَاعْلَمْ أَنَّمَا يَتَّبِعُونَ أَهْوَاءَهُمْ ۚ وَمَنْ أَضَلُّ مِمَّنِ اتَّبَعَ هَوَاهُ بِغَيْرِ هُدًى مِنَ اللَّهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ50

फिर यदि वे पूरी न करें आपकी माँग, तो आप जान लें कि वे मनमानी कर रहे हैं और उससे अधिक कुपथ कौन है, जो अपनी मनमानी करे, अल्लाह की ओर से बिना किसी मार्गदर्शन के? वास्तव में, अल्लाह सुपथ नहीं दिखाता है अत्याचारी लोगों को।
28:51जुज़ 20 · पृ. 392

۞ وَلَقَدْ وَصَّلْنَا لَهُمُ الْقَوْلَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ51

और (हे नबी!) हमने निरन्तर पहुँचा दिया है उन्हें अपनी बात (क़ुर्आन), ताकि वे शिक्षा ग्रहण करें।
28:52जुज़ 20 · पृ. 392

الَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ مِنْ قَبْلِهِ هُمْ بِهِ يُؤْمِنُونَ52

जिन्हें हमने प्रदान की है पुस्तक[1] इस (क़ुर्आन) से पहले, वे[2] इसपर ईमान लाते हैं।
____________________
1. अर्थात तौरात तथा इंजील। 2. अर्थात उन में से जिन्हों ने अपनी मूल पुस्तक में परिवर्तन नहीं किया है।
28:53जुज़ 20 · पृ. 392

وَإِذَا يُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ قَالُوا آمَنَّا بِهِ إِنَّهُ الْحَقُّ مِنْ رَبِّنَا إِنَّا كُنَّا مِنْ قَبْلِهِ مُسْلِمِينَ53

तथा जब उन्हें सुनाया जाता है, तो कहते हैं: हम इस (क़ुर्आन) पर ईमान लाये, वास्तव में, ये सत्य है, हमारे पालनहार की ओर से, हम तो इसके (उतरने के) पहले ही से मुस्लिम हैं[1]।
____________________
1. अर्थात आज्ञाकारी तथा एकेश्वरवादी हैं।
28:54जुज़ 20 · पृ. 392

أُولَٰئِكَ يُؤْتَوْنَ أَجْرَهُمْ مَرَّتَيْنِ بِمَا صَبَرُوا وَيَدْرَءُونَ بِالْحَسَنَةِ السَّيِّئَةَ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنْفِقُونَ54

यही दिये जायेंगे अपना बदला दुहरा,[1] अपने धैर्य के कारण और वे दूर करते हैं अच्छाई के द्वारा बुराई को और उसमें से, जो हमने उन्हें दिया है, दान करते हैं।
____________________
1. अपनी पुस्तक तथा क़ुर्आन दोनों पर ईमान लाने के कारण। (देखियेः सह़ीह़ बुख़ारीः97, मुस्लिमः154)
28:55जुज़ 20 · पृ. 392

وَإِذَا سَمِعُوا اللَّغْوَ أَعْرَضُوا عَنْهُ وَقَالُوا لَنَا أَعْمَالُنَا وَلَكُمْ أَعْمَالُكُمْ سَلَامٌ عَلَيْكُمْ لَا نَبْتَغِي الْجَاهِلِينَ55

और जब वह सुनते हैं व्यर्थ बात, तो विमुख हो जाते हैं, उससे तथा कहते हैं: हमारे लिए हमारे कर्म हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म। सलाम है तुमपर, हम (उलझना) नहीं चाहते अज्ञानों से ।
28:56जुज़ 20 · पृ. 392

إِنَّكَ لَا تَهْدِي مَنْ أَحْبَبْتَ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ يَهْدِي مَنْ يَشَاءُ ۚ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِينَ56

(हे नबी!) आप सुपथ नहीं दर्शा सकते, जिसे चाहें[1], परन्तु अल्लाह सुपथ दर्शाता है, जिसे चाहे और वह भली-भाँति जानता है सुपथ प्राप्त करने वालों को।
____________________
1. ह़दीस में वर्णित है कि जब नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के (काफ़िर) चाचा अबू तालिब के निधन का समय हुआ, तो आप उन के पास गये। उस समय उन के पास अबू जह्ल तथा अब्दुल्लाह बिन अबि उमय्या उपस्थित थे। आप ने कहाः चाचा ((ला इलाहा इल्लल्लाह)) कह दें ताकि मैं क़्यामत के दिन अल्लाह से आप की क्षमा के लिये शिफ़ारिश कर सकूँ। परन्तु दोनों के कहने पर उन्हों ने अस्वीकार कर दिया और उन का अन्त कुफ़्र पर हुआ। इसी विषय में यह आयत उतरी। (सह़ीह़ बुख़ारी ह़दीस संख्याः4772)
28:57जुज़ 20 · पृ. 392

وَقَالُوا إِنْ نَتَّبِعِ الْهُدَىٰ مَعَكَ نُتَخَطَّفْ مِنْ أَرْضِنَا ۚ أَوَلَمْ نُمَكِّنْ لَهُمْ حَرَمًا آمِنًا يُجْبَىٰ إِلَيْهِ ثَمَرَاتُ كُلِّ شَيْءٍ رِزْقًا مِنْ لَدُنَّا وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ57

तथा उन्होंने कहाः यदि हम अनुसरण करें मार्गदर्शन का आपके साथ, तो अपनी धरती से उचक[1] लिए जायेंगे। क्या हमने निवास स्थान नहीं बनाया है भयरहित "ह़रम"[2] को उनके लिए, खिंचे चले आ रहे हैं जिसकी ओर प्रत्येक प्रकार के फल, जीविका स्वरूप, हमारे पास से? और परन्तु उनमें से अधिक्तर लोग नहीं जानते।
____________________
1. अर्थात हमारे विरोधी हम पर आक्रमण कर देंगे। 2. अर्थात मक्का नगर को।
28:58जुज़ 20 · पृ. 392

وَكَمْ أَهْلَكْنَا مِنْ قَرْيَةٍ بَطِرَتْ مَعِيشَتَهَا ۖ فَتِلْكَ مَسَاكِنُهُمْ لَمْ تُسْكَنْ مِنْ بَعْدِهِمْ إِلَّا قَلِيلًا ۖ وَكُنَّا نَحْنُ الْوَارِثِينَ58

और हमने विनाश कर दिया बहुत-सी बस्तियों का, इतराने लगी जिनकी जीविका। तो ये हैं उनके घर, जो आबाद नहीं किये गये उनके पश्चात्, परन्तु बहुत थोड़े और हम ही उत्तराधिकारी रह गये।
28:59जुज़ 20 · पृ. 392

وَمَا كَانَ رَبُّكَ مُهْلِكَ الْقُرَىٰ حَتَّىٰ يَبْعَثَ فِي أُمِّهَا رَسُولًا يَتْلُو عَلَيْهِمْ آيَاتِنَا ۚ وَمَا كُنَّا مُهْلِكِي الْقُرَىٰ إِلَّا وَأَهْلُهَا ظَالِمُونَ59

और नहीं है आपका पालनहार विनाश करने वाला बस्तियों को, जब तक उनके केंद्र में कोई रसूल नहीं भेजता, जो पढ़कर सुनायें उनके समक्ष हमारी आयतें और हम बस्तियों का विनाश करने वाले नहीं हैं, परन्तु जब उसके निवासी अत्याचारी हों।
28:60जुज़ 20 · पृ. 393

وَمَا أُوتِيتُمْ مِنْ شَيْءٍ فَمَتَاعُ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَزِينَتُهَا ۚ وَمَا عِنْدَ اللَّهِ خَيْرٌ وَأَبْقَىٰ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ60

तथा जो कुछ तुम दिये गये हो, वह सांसारिक जीवन का सामान तथा उसकी शोभा है और जो अल्लाह के पास है उत्तम तथा स्थायी है, तो क्या तुम समझते नहीं हो?
28:61जुज़ 20 · पृ. 393

أَفَمَنْ وَعَدْنَاهُ وَعْدًا حَسَنًا فَهُوَ لَاقِيهِ كَمَنْ مَتَّعْنَاهُ مَتَاعَ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ثُمَّ هُوَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ مِنَ الْمُحْضَرِينَ61

तो क्या जिसे हमने वचन दिया है एक अच्छा वचन और वह पाने वाला हो उसे, उसके जैसा हो सकता है, जिसे हमने दे रखा है सांसारिक जीवन का सामान, फिर वह प्रलय के दिन उपस्थित किये लोगों में होगा[1]?
____________________
1. अर्थात दण्ड और यातना का अधिकारी होगा।
28:62जुज़ 20 · पृ. 393

وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ فَيَقُولُ أَيْنَ شُرَكَائِيَ الَّذِينَ كُنْتُمْ تَزْعُمُونَ62

और जिस दिन वह[1] उन्हें पुकारेगा, तो कहेगाः कहाँ हैं मेरे साझी, जिन्हें तुम समझ रहे थे?
____________________
1. अर्थात अल्लाह प्रलय के दिन पुकारेगा।
28:63जुज़ 20 · पृ. 393

قَالَ الَّذِينَ حَقَّ عَلَيْهِمُ الْقَوْلُ رَبَّنَا هَٰؤُلَاءِ الَّذِينَ أَغْوَيْنَا أَغْوَيْنَاهُمْ كَمَا غَوَيْنَا ۖ تَبَرَّأْنَا إِلَيْكَ ۖ مَا كَانُوا إِيَّانَا يَعْبُدُونَ63

कहेंगे वे जिनपर सिध्द हो चुकी है ये बातः[1] हे हमारे पालनहार! यही हैं, जिन्हें हमने बहका दिया और हमने इन्हें बहकाया, जैसे हम बहके, हम उनसे अलग हो रहे हैं तेरे समक्ष, ये हमारी पूजा[2] नहीं कर रहे थे।
____________________
1. अर्थात दण्ड और यातना का अधिकारी होने की। 2. यह हमारे नहीं बल्कि अपने मन के पुजारी थे।
28:64जुज़ 20 · पृ. 393

وَقِيلَ ادْعُوا شُرَكَاءَكُمْ فَدَعَوْهُمْ فَلَمْ يَسْتَجِيبُوا لَهُمْ وَرَأَوُا الْعَذَابَ ۚ لَوْ أَنَّهُمْ كَانُوا يَهْتَدُونَ64

तथा कहा जायेगाः पुकारो अपने साझियों को। तो वे पुकारेंगे और वे उन्हें उत्तर तक नहीं देंगे तथा वे यातना देख लेंगे, तो कामना करेंगे कि उन्होंने सुपथ अपनाया होता।
28:65जुज़ 20 · पृ. 393

وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ فَيَقُولُ مَاذَا أَجَبْتُمُ الْمُرْسَلِينَ65

और वह (अल्लाह) उस दिन उन्हें पुकारेगा, फिर कहेगाः तुमने क्या उत्तर दिया रसूलों को?
28:66जुज़ 20 · पृ. 393

فَعَمِيَتْ عَلَيْهِمُ الْأَنْبَاءُ يَوْمَئِذٍ فَهُمْ لَا يَتَسَاءَلُونَ66

तो नहीं सूझेगा उन्हें कोई उत्तर उस दिन और न वह एक-दूसरे से प्रश्न कर सकेंगे।
28:67जुज़ 20 · पृ. 393

فَأَمَّا مَنْ تَابَ وَآمَنَ وَعَمِلَ صَالِحًا فَعَسَىٰ أَنْ يَكُونَ مِنَ الْمُفْلِحِينَ67

फिर जिसने क्षमा माँग ली[1] तथा ईमान लाया और सदाचार किया, तो आशा कर सकता है कि वह सफल होने वालों में से होगा।
____________________
1. अर्थात संसार में से।
28:68जुज़ 20 · पृ. 393

وَرَبُّكَ يَخْلُقُ مَا يَشَاءُ وَيَخْتَارُ ۗ مَا كَانَ لَهُمُ الْخِيَرَةُ ۚ سُبْحَانَ اللَّهِ وَتَعَالَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ68

और आपका पालनहार उत्पन्न करता है जो चाहे तथा निर्वाचित करता है। नहीं है उनके लिए कोई अधिकार, पवित्र है अल्लाह तथा उच्च है उनके साझी बनाने से।
28:69जुज़ 20 · पृ. 393

وَرَبُّكَ يَعْلَمُ مَا تُكِنُّ صُدُورُهُمْ وَمَا يُعْلِنُونَ69

और आपका पालनहार ही जानता है, जो छुपाते हैं उनके दिल तथा जो व्यक्त करते हैं।
28:70जुज़ 20 · पृ. 393

وَهُوَ اللَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ لَهُ الْحَمْدُ فِي الْأُولَىٰ وَالْآخِرَةِ ۖ وَلَهُ الْحُكْمُ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ70

तथा वही अल्लाह[1] है, कोई वन्दनीय (सत्य पूज्य) नहीं है उसके सिवा, उसी के लिए सब प्रशंसा है लोक तथा परलोक में तथा उसी के लिए शासन है और तुम उसी की ओर फेरे[2] जाओगो।
____________________
1. अर्थात जो उत्पत्ति करता तथा सब अधिकार और ज्ञान रखता है। 2.अर्थात ह़िसाब और प्रतिफल के लिये।
28:71जुज़ 20 · पृ. 394

قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِنْ جَعَلَ اللَّهُ عَلَيْكُمُ اللَّيْلَ سَرْمَدًا إِلَىٰ يَوْمِ الْقِيَامَةِ مَنْ إِلَٰهٌ غَيْرُ اللَّهِ يَأْتِيكُمْ بِضِيَاءٍ ۖ أَفَلَا تَسْمَعُونَ71

(हे नबी!) आप कहियेः तुम बताओ कि यदि बना दे तुमपर रात्रि को निरन्तर क़्यामत के दिन तक, तो कौन पूज्य है अल्लाह कि सिवा, जो ले आये तुम्हारे पास प्रकाश? तो क्या तुम सुनते नहीं हो?
28:72जुज़ 20 · पृ. 394

قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِنْ جَعَلَ اللَّهُ عَلَيْكُمُ النَّهَارَ سَرْمَدًا إِلَىٰ يَوْمِ الْقِيَامَةِ مَنْ إِلَٰهٌ غَيْرُ اللَّهِ يَأْتِيكُمْ بِلَيْلٍ تَسْكُنُونَ فِيهِ ۖ أَفَلَا تُبْصِرُونَ72

आप कहियेः तुम बताओ, यदि अल्लाह कर दे तुमपर दिन को निरन्तर क़्यामत के दिन तक, तो कौन पूज्य है अल्लाह के सिवा, जो ले आये तुम्हारे लिए रात्रि, जिसमें तुम शान्ति प्राप्त करो, तो क्या तुम देखते नहीं[1] हो?
____________________
1. अर्थात रात्रि तथा दिन के परिवर्तन को।
28:73जुज़ 20 · पृ. 394

وَمِنْ رَحْمَتِهِ جَعَلَ لَكُمُ اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ لِتَسْكُنُوا فِيهِ وَلِتَبْتَغُوا مِنْ فَضْلِهِ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ73

तथा अपनी दया ही से उसने बनाये हैं तुम्हारे लिए रात्रि तथा दिन, ताकि तुम शान्ति प्राप्त करो उसमें और ताकि तुम खोज करो उसके अनुग्रह (जीविका) की और ताकि तुम उसके कृतज्ञ बनो।
28:74जुज़ 20 · पृ. 394

وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ فَيَقُولُ أَيْنَ شُرَكَائِيَ الَّذِينَ كُنْتُمْ تَزْعُمُونَ74

और अल्लाह, जिस दिन उन्हें पुकारेगा, तो कहेगाः कहाँ हैं वे, जिन्हें तुम मेरा साझी समझ रहे थे?
28:75जुज़ 20 · पृ. 394

وَنَزَعْنَا مِنْ كُلِّ أُمَّةٍ شَهِيدًا فَقُلْنَا هَاتُوا بُرْهَانَكُمْ فَعَلِمُوا أَنَّ الْحَقَّ لِلَّهِ وَضَلَّ عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَفْتَرُونَ75

और हम निकाल लायेंगे प्रत्येक समुदाय से एक गवाह, फिर कहेंगेः लाओ अपने[1] तर्क? तो उन्हें ज्ञान हो जायेगा कि सत्य अल्लाह ही की ओर है और उनसे खो जायेंगी, जो बातें वे घड़ रहे थे।
____________________
1. अर्थात शिर्क के प्रमाण।
28:76जुज़ 20 · पृ. 394

۞ إِنَّ قَارُونَ كَانَ مِنْ قَوْمِ مُوسَىٰ فَبَغَىٰ عَلَيْهِمْ ۖ وَآتَيْنَاهُ مِنَ الْكُنُوزِ مَا إِنَّ مَفَاتِحَهُ لَتَنُوءُ بِالْعُصْبَةِ أُولِي الْقُوَّةِ إِذْ قَالَ لَهُ قَوْمُهُ لَا تَفْرَحْ ۖ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْفَرِحِينَ76

क़ारून[1] था मूसा की जाति में से। फिर उसने अत्याचार किया उनपर और हमने उसे प्रदान किया इतने कोष कि उसकी कुंजियाँ भारी थीं एक शक्तिशाली समुदाय पर। जब कहा उससे उसकी जाति नेः मत इतरा, वास्तव में, अल्लाह प्रेम नहीं करता है इतराने वालों से।
____________________
1. यहाँ से धन के गर्व तथा उस के दुष्परिणाम का एक उदाहरण दिया जा रहा है कि क़ारून, मूसा (अलैहिस्सलाम) के युग का एक धनी व्यक्ति था।
28:77जुज़ 20 · पृ. 394

وَابْتَغِ فِيمَا آتَاكَ اللَّهُ الدَّارَ الْآخِرَةَ ۖ وَلَا تَنْسَ نَصِيبَكَ مِنَ الدُّنْيَا ۖ وَأَحْسِنْ كَمَا أَحْسَنَ اللَّهُ إِلَيْكَ ۖ وَلَا تَبْغِ الْفَسَادَ فِي الْأَرْضِ ۖ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمُفْسِدِينَ77

तथा खोजकर उससे, जो दिया है अल्लाह ने तुझे आख़िरत (परलोक) का घर और मत भूल अपना सांसारिक भाग और उपकार कर, जैसे अल्लाह ने तुझपर उपकार किया है तथा मत खोज कर धरती में उपद्रव की, निश्चय अल्लाह प्रेम नहीं करता है उपद्रवियों से।
28:78जुज़ 20 · पृ. 395

قَالَ إِنَّمَا أُوتِيتُهُ عَلَىٰ عِلْمٍ عِنْدِي ۚ أَوَلَمْ يَعْلَمْ أَنَّ اللَّهَ قَدْ أَهْلَكَ مِنْ قَبْلِهِ مِنَ الْقُرُونِ مَنْ هُوَ أَشَدُّ مِنْهُ قُوَّةً وَأَكْثَرُ جَمْعًا ۚ وَلَا يُسْأَلُ عَنْ ذُنُوبِهِمُ الْمُجْرِمُونَ78

उसने कहाः मैं तो उसे दिया गया हूँ बस अपने ज्ञान के कारण। क्या उसे ये ज्ञान नहीं हुआ कि अल्लाह ने विनाश किया है उससे पहले बहुत-से समुदायों को, जो उससे अधिक थे धन तथा समूह में और प्रश्न नहीं किया जाता[1] अपने पापों के संबन्ध में अपराधियों से।
____________________
1. अर्थात विनाश के समय।
28:79जुज़ 20 · पृ. 395

فَخَرَجَ عَلَىٰ قَوْمِهِ فِي زِينَتِهِ ۖ قَالَ الَّذِينَ يُرِيدُونَ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا يَا لَيْتَ لَنَا مِثْلَ مَا أُوتِيَ قَارُونُ إِنَّهُ لَذُو حَظٍّ عَظِيمٍ79

एक दिन, वह निकला अपनी जाति पर, अपनी शोभा में, तो कहा उन लोगों ने, जो चाहते थे सांसारिक जीवनः क्या ही अच्छा होता कि हमारे लिए (भी) उसी के समान (धन-धान्य) होता, जो दिया गया है क़ारून को! वास्तव में, वह बड़ा सौभाग्यशाली है।
28:80जुज़ 20 · पृ. 395

وَقَالَ الَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ وَيْلَكُمْ ثَوَابُ اللَّهِ خَيْرٌ لِمَنْ آمَنَ وَعَمِلَ صَالِحًا وَلَا يُلَقَّاهَا إِلَّا الصَّابِرُونَ80

तथा उन्होंने कहा जिन्हें ज्ञान दिया गयाः तुम्हारा बुरा हो! अल्लाह का प्रतिकार उसके लिए उत्तम है, जो ईमान लाये तथा सदाचार करे और ये सोच, धैर्यवानों ही को मिलती है।
28:81जुज़ 20 · पृ. 395

فَخَسَفْنَا بِهِ وَبِدَارِهِ الْأَرْضَ فَمَا كَانَ لَهُ مِنْ فِئَةٍ يَنْصُرُونَهُ مِنْ دُونِ اللَّهِ وَمَا كَانَ مِنَ الْمُنْتَصِرِينَ81

तथा हमने धंसा दिया उसके तथा उसके घर सहित, धरती को, तो नहीं रह गया उसका कोई समुदाय, जो सहायता करे उसकी अल्लाह के आगे और न वह स्वयं अपनी सहायता कर सका।
28:82जुज़ 20 · पृ. 395

وَأَصْبَحَ الَّذِينَ تَمَنَّوْا مَكَانَهُ بِالْأَمْسِ يَقُولُونَ وَيْكَأَنَّ اللَّهَ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَنْ يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ وَيَقْدِرُ ۖ لَوْلَا أَنْ مَنَّ اللَّهُ عَلَيْنَا لَخَسَفَ بِنَا ۖ وَيْكَأَنَّهُ لَا يُفْلِحُ الْكَافِرُونَ82

और जो कामना कर रहे थे उसके स्थान की कल, कहन लगेः क्या तुम देखते नहीं कि अल्लाह अधिक कर देता है जीविका, जिसके लिए चाहता हो अपने दासों में से और नापकर देता है (जिसे चाहता है)। यदि हमपर उपकार न होता अल्लाह का, तो हमें भी धंसा देता। क्या तुम देखते नहीं कि काफ़िर (कृतघ्न) सफल नहीं होते?
28:83जुज़ 20 · पृ. 395

تِلْكَ الدَّارُ الْآخِرَةُ نَجْعَلُهَا لِلَّذِينَ لَا يُرِيدُونَ عُلُوًّا فِي الْأَرْضِ وَلَا فَسَادًا ۚ وَالْعَاقِبَةُ لِلْمُتَّقِينَ83

ये परलोक का घर (स्वर्ग) है, हम उसे विशेष कर देंगे उनके लिए, जो नहीं चाहते बड़ाई करना धरती में और न उपद्रव करना और अच्छा परिणाम अज्ञाकारियों[1] के लिए है।
____________________
1. इस में संकेत है कि धरती में गर्व तथा उपद्रव का मूलाधार अल्लाह की अवैज्ञा है।
28:84जुज़ 20 · पृ. 395

مَنْ جَاءَ بِالْحَسَنَةِ فَلَهُ خَيْرٌ مِنْهَا ۖ وَمَنْ جَاءَ بِالسَّيِّئَةِ فَلَا يُجْزَى الَّذِينَ عَمِلُوا السَّيِّئَاتِ إِلَّا مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ84

जो भलाई लायेगा, उसके लिए उससे उत्म (भलाई) है और जो बुराई लायेगा, तो नहीं बदला दिये जायेंगे वे, जिन्होंने बुराईयाँ की हैं, परन्तु वही जो वे करते रहे।
28:85जुज़ 20 · पृ. 396

إِنَّ الَّذِي فَرَضَ عَلَيْكَ الْقُرْآنَ لَرَادُّكَ إِلَىٰ مَعَادٍ ۚ قُلْ رَبِّي أَعْلَمُ مَنْ جَاءَ بِالْهُدَىٰ وَمَنْ هُوَ فِي ضَلَالٍ مُبِينٍ85

और (हे नबी!) जिसने आपपर क़ुर्आन उतारा है, वह आपको लौटाने वाला है आपके नगर (मक्का) की[1] ओर। आप कह दें कि मेरा पालनहर भली-भाँति जानने वाला है कि कौन मार्गदरशन लाया है और कौन खुले कुपथ में है?
____________________
1. अर्थात आप जिस शहर मक्का से निकाले गये हैं उसे विजय कर लेंगे। और यह भविष्यवाणी सन् 8 हिजरी में पूरी हुई। (सह़ीह़ बुख़ारीः 4773)
28:86जुज़ 20 · पृ. 396

وَمَا كُنْتَ تَرْجُو أَنْ يُلْقَىٰ إِلَيْكَ الْكِتَابُ إِلَّا رَحْمَةً مِنْ رَبِّكَ ۖ فَلَا تَكُونَنَّ ظَهِيرًا لِلْكَافِرِينَ86

और आप आशा नहीं रखते थे कि अवतरित की जायेगी आपकी ओर ये पुस्तक[1], परन्तु ये दया है, आपके पालनहार की ओर से, अतः आप कदापि न हों सहायक, काफ़िरों के।
____________________
1. अर्थात क़ुर्आन पाक।
28:87जुज़ 20 · पृ. 396

وَلَا يَصُدُّنَّكَ عَنْ آيَاتِ اللَّهِ بَعْدَ إِذْ أُنْزِلَتْ إِلَيْكَ ۖ وَادْعُ إِلَىٰ رَبِّكَ ۖ وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْمُشْرِكِينَ87

और वह आपको न रोकें अल्लाह की आयतों से, इसके पश्चात् कि उतार दी गई आपकी ओर और आप बुलाते रहें अपने पालनहार की ओर और कदापि आप न हों मुश्रिकों में से।
28:88जुज़ 20 · पृ. 396

وَلَا تَدْعُ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ ۘ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۚ كُلُّ شَيْءٍ هَالِكٌ إِلَّا وَجْهَهُ ۚ لَهُ الْحُكْمُ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ88

और आप न पुकारें किसी अन्य पूज्य को अल्लाह के साथ, नहीं है कोई वंदनीय (सत्य पूज्य) उस (अल्लाह) के सिवा। प्रत्येक वस्तु नाशवान है सिवाय उसके स्वरूप के। उसी का शासन है और उसी की ओर तुमसब फेरे[1] जाओगे।
____________________
1. अर्थात प्रयलय के दिन ह़िसाब तथा अपने कर्मों का फल पाने के लिये।

सूरह के आरंभ से चलाएँ